Wednesday, 26 August 2026
INTइंडियन न्यूज़ ट्रस्टजहाँ सत्य मिले विश्वास से
ताज़ा खबरें

समाचार · उत्तराखंड

Hiljatra: जंजीरों से बंधे और हुंकार भरते लखिया भूत को देखने उमड़ती है भीड़, सदियों पुरानी है यह वीरगाथा

INT News25 August 2026 at 12:19 pm

संतोष आर्यन, पिथौरागढ़HilJatra: हुड़के की गूंज, ढोल-दमाऊ की थाप और माटी की अटूट आस्था के बीच पिथौरागढ़ में कुमौड़ का ऐतिहासिक मैदान सोरघाटी की जीवंत लोकसंस्कृति का साक्षी बना। न कोई मंच था, न कोई पर्दा...बस माटी की सोंधी महक और लकड़ी के मुखौटों के पीछे धड़कता सोर का दिल। मैदान में जब गल्या बैल, हुक्का पीते किसान उतरे, तो लगा मानो कृषि संस्कृति खुद मुस्कुरा उठी हो और जैसे ही शिव के गण लखिया भूत का मैदान में अवतरण हुआ, पूरा कुमौड़ जयकारों से गूंज उठा। लखिया भूत का भव्य स्वरूप और पारंपरिक पात्रों ने नेपाल नरेश के दरबार से लेकर चार महर भाइयों के शौर्य की उस अनूठी गाथा को जीवंत कर दिया, जिसकी गवाह वर्षो से यह सीमांत माटी बनती आई है।कुमौड़ की प्रसिद्ध हिलजात्रा में लखिया भूत की एक झलक पाने को लोग बेताब नजर आए। लखिया भूत के मैदान में आते ही उसके जयकारों से सोर घाटी गुंजायमान हो गई। इस दौरान भारी संख्या में पहुंचे लोग भगवान शिव के गण लखिया पर पुष्प वर्षा करते रहे।हिलजात्रा उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं का पर्वनगर में सुबह से ही लोग हिलजात्रा को लेकर उत्साहित नजर आए। मुख्य मैदान के आसपास तीन बजे से लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। करीब पांच बजकर 45 मिनट में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वर्चुअली संबोधित किया। उन्होंने आयोजक समिति की सराहना करते हुए हिलजात्रा उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण पर्व है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार घर-घर में मां गौरा और भगवान महेश्वर की पारंपरिक पूजा के साथ सातूं-आठूं पर्व से हिलजात्रा की भक्ति धारा प्रवाहित होती है, उसी प्रकार सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की धारा निरंतर प्रवाहित होती रहे।500 सालों से मनाई जा रही हिलजात्रामुख्यमंत्री ने कहा कि 500 वर्षों से अधिक समय से मनाया जा रहा हिलजात्रा पर्व पिथौरागढ़ की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं की विशिष्ट पहचान बन चुका है। सोरघाटी की यह ऐतिहासिक हिलजात्रा हमारी आस्था, विश्वास और समृद्ध परंपराओं का प्रतीक होने के साथ ही पहाड़ी जीवन के संघर्ष, साधना और कृषि-पशुपालन पर आधारित ग्रामीण जीवन की विशिष्टताओं को भी दर्शाती है।छह बजकर 10 मिनट के करीब लोगों से खचाखच भरे मैदान के बीच परंपरागत तरीके से ढोल नगाड़ों के साथ कोलबाड़ा से लखिया भूत मुख्य मैदान की तरफ अपने दो गणों के साथ रवाना हुआ। वहां पहुंचते ही लोगों ने लखिया भूत के जयकारे लगाते हुए फूलों की बारिश की। लखिया भूत ने शानदार अभिनय से आधे घंटे से अधिक समय तक लोगों को मंत्रमुग्ध किया व अपना आशीष दिया। हिलजात्रा में डल्ले फोड़ती महिलाएं, गलिया बैलों की जोड़ी, खेत में हुक्का पीते किसान व अन्य कलाकारों का प्रदर्शन सराहनीय रहा। हिलजात्रा कमेटी के गोपू महर ने सभी का आभार जताया है।लखिया का अवतरण, हिलजात्रा का मुख्य आकर्षणहिलजात्रा का सबसे मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाला क्षण तब आता है, जब भगवान शिव के गण माने जाने वाले लखिया भूत का मैदान में प्रवेश होता है। जंजीरो से बंधे, हुंकार भरते लखिया को देखते ही मैदान में मौजूद हजारों लोगों का हुजूम एक स्वर में जय भोले के उद्घोष से गूंज उठता है।वीरभद्र का अवतार है बाबा लाखिया भूतलखिया को भगवान शिव के प्रमुख गण वीरभद्र का अवतार माना जाता है। लखिया भूत लोगों को सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देने के साथ अगले वर्ष आने का वादा कर चला जाता है। मान्यता है कि वीरभद्र के स्वरुप लखिया भूत भगवान शिव की जटाओं से उत्पन्न हुए।देशभर में मुखौटा नृत्यों की रंगतकुमौड़ में आयोजित होने वाली प्रसिद्ध हिलजात्रा राज्य का एकमात्र लोक नाट्य है जो पूरी तरह मुखौटा नृत्य पर आधारित है। देश के कई अन्य राज्यों में भी मुखौटा पहनाने की यह अद्भुत सांस्कृतिक परंपरा बेहद लोकप्रिय है। जानकारी के अनुसार पश्चिम बंगाल, झारखंड ओडिशा, असम, केरल, कर्नाटक में भी रंग-बिरंगे मुखौटे पर आधारित लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।इन्होंने निभाई हिलजात्रा में मुख्य पात्रों की भूमिका● लखियाभूत नीरज महर● गण गौरव महर, पीयूष महर● गल्या बल्द श्लोक आर्दश, अज्जू● पंडित काव्य● हलिया प्रियांशु, विनीत, मोहित● बौड़िया हौल तनिष्क, दीपेश● भालू चीनू मेहता● छोटी हौल कृष, वेदू● नेपाली हौल सार्थक, दिव्यम