Friday, 30 October 2026
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4 करोड़ वापस लेने कारोबारी ने दुर्ग में लगाई अर्जी:कोर्ट ने खारिज किया, व्यापारी ने कहा- हमारा करोड़ों का व्यापार, हमारे खाते में 53 करोड़ से ज्यादा, कोर्ट ने कहा- जांच होगी

INT News30 October 2026 at 09:49 pm

छत्तीसगढ़ के रायपुर-दुर्ग मुख्य मार्ग पर खुर्सीपार पुलिस द्वारा संदिग्ध परिस्थितियों में जब्त की गई 4 करोड़ रुपए की भारी-भरकम नकदी को वापस पाने के लिए कारोबारी द्वारा लगाई गई याचिका को दुर्ग की अदालत ने खारिज कर दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अंजली सिंह की अदालत ने आवेदक कमलेश आर. शाह द्वारा प्रस्तुत सुपुर्दनामा आवेदन और जब्ती रोकने संबंधी दोनों आवेदनों पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मामले की जांच अब आयकर विभाग द्वारा शुरू की जा चुकी है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्याय दृष्टांतों का हवाला देते हुए निर्णय दिया कि आयकर जांच लंबित रहने तक जब्त की गई इस रकम को सुपुर्दनामे पर आवेदक को नहीं सौंपा जा सकता। जानिए क्या है पूरा मामला ?

25 अक्टूबर की रात लगभग 9 बजे खुर्सीपार थाना पुलिस ने रायपुर-दुर्ग मुख्य मार्ग पर संदेह के आधार पर वाहन क्रमांक CG 04 QU 5996 को रोककर तलाशी ली थी। वाहन से 500, 200 और 100 रुपए के नोटों के रूप में कुल 4,00,00,000 रुपए नगद बरामद किए गए थे। उस समय गाड़ी में भावेश भाई डाभी और विष्णुदेव दुबे सवार थे। पुलिस ने बीएनएसएस की धारा 106 के तहत कार्रवाई करते हुए पूरी रकम और वाहन को जब्त कर लिया था। कारोबारी ने कोर्ट में कहा- हमारे पास करोड़ों रुपए का व्यापार, 53 करोड़ से ज्यादा कैश

आवेदक कमलेश आर. शाह (पत्नी स्व. नीना शाह, फर्म मेसर्स मेक टेक के विधिक वारिस) ने अपने अधिवक्ता राकेश पुरी के माध्यम से कोर्ट में सुपुर्दनामा आवेदन दायर कर रकम वापसी की मांग की। कोर्ट में उन्होंने तर्क दिया कि उनकी पत्नी नीना शाह अपने जीवनकाल में कृषि आधारित व्यवसाय मेसर्स मेक टेक (M/S MECTEC) का संचालन करती थीं। फर्म भारत सरकार के उद्योग विभाग (उद्योग आधार) और केंद्रीय भंडार में पंजीकृत है। फर्म प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए का व्यापार और भारी टैक्स अदा करती है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में फर्म ने 1,08,22,242 का आयकर जमा किया था। वित्तीय वर्ष 2025-26 की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार फर्म के पास नगद व बैंक खातों में 53,93,69,148.72 रुपए मौजूद हैं। 12 अक्टूबर 2025 को पत्नी के निधन के बाद अकोला न्यायालय द्वारा उन्हें विधिवत उत्तराधिकारी घोषित किया गया है। वे और उनकी पुत्रियां (खुशबू व खुशाली) वैध वारिस हैं और वही व्यापार का संचालन कर रहे हैं। फर्म का एक कार्यालय नागपुर में भी स्थित है। व्यापारिक जरूरतों के लिए समय-समय पर नगदी लाई-ले जाई जाती है। इसी क्रम में 25 अक्टूबर को जेट ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन की गाड़ी से 4 करोड़ रुपए रायपुर से नागपुर ले जाए जा रहे थे, जिसमें फर्म का कर्मचारी भावेश भाई डाभी मौजूद था। सुरक्षा के लिए नोटों को गु्प्त चैंबर में डलवाया

व्यापारी ने तर्क दिया कि रकम पुलिस कस्टडी में रहने से नोटों के सीलन से खराब, अनुपयोगी या चोरी/गुम होने की संभावना है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य के न्याय दृष्टांत का हवाला दिया कि जब्त संपत्ति को शर्तो पर छोड़ा जाना चाहिए। आवेदक ने एक अतिरिक्त आवेदन देकर यह भी गुहार लगाई कि 4 करोड़ रुपए की यह राशि कोर्ट की अनुमति के बिना किसी अन्य विभाग/अधिकारी को न सौंपी जाए और न ही कहीं ट्रांसफर की जाए।

पुलिस और आयकर विभाग ने दर्ज कराई आपत्तियां

थाना प्रभारी खुर्सीपार और केस डायरी के माध्यम से आयकर विभाग ने सुपुर्दनामा का कड़ा विरोध किया। कहा कि मौके पर 4 करोड़ रुपए के साथ पकड़े गए दोनों व्यक्तियों विष्णुदेव दुबे और भावेश भाई डाभी ने प्राथमिक जांच व पूछताछ में रकम को जेट ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन एवं जय श्री गोल्डन मार्केट भनपुरी रायपुर के ट्रांसपोर्ट बिजनेस का पैसा बताया था। जबकि बाद में आवेदक कमलेश शाह ने इसे मेक टेक फर्म का पैसा बताया। इस विरोधाभास के कारण वास्तविक स्वामित्व और वैधानिक स्रोत का सत्यापन आवश्यक है।

पुलिस ने बताया कि आवेदक ने ऐसा कोई वेतन भुगतान या अधिकार पत्र पेश नहीं किया है जिससे यह प्रमाणित हो सके कि मौके पर पकड़े गए दोनों व्यक्ति उनके अधिकृत या वेतनभोगी कर्मचारी हैं। आयकर विभाग ने कोर्ट को सूचित किया कि धारा 132A / आयकर अधिनियम लागू प्रावधानों के तहत प्रकरण की 9 पन्नों की विस्तृत जांच प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, यह राशि किसी को न सौंपी जाए। इसके बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अंजली सिंह ने आयकर विभाग द्वारा जांच प्रारंभ की जा चुकी होने के कारण आवेदक कमलेश शाह की 4 करोड़ रुपए सुपुर्दनामे पर पाने की याचिका निरस्त कर दी। साथ ही कहा कि चूंकि आयकर विभाग जांच शुरू कर चुका है, अतः रकम को कहीं ट्रांसफर न करने संबंधी आवेदक का दूसरा आवेदन भी औचित्यहीन मानते हुए निरस्त कर किया जाता है।