Monday, 12 October 2026
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दिन में तीन रूप बदलती हैं दतिया की खैरी माता:सुबह बाल रूप, दोपहर में युवा और शाम को वृद्ध स्वरूप में दर्शन देती हैं

INT News12 October 2026 at 04:11 pm

दतिया जिला मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर दूर ग्राम खैरी की पहाड़ी पर स्थित खैरी माता मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यहां विराजित मां काली दिन में तीन स्वरूप बदलती हैं। सुबह माता का बाल रूप, दोपहर में युवावस्था और शाम को वृद्धावस्था का स्वरूप दिखाई देता है। शारदीय और चैत्र नवरात्र के साथ साल में दो बार पड़ने वाली गुप्त नवरात्र में भी यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्र में मंदिर परिसर में मेला भी लगता है। खैर के पेड़ों से पड़ा खैरी माता नाम मंदिर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। बताया जाता है कि पहले इस पहाड़ी पर खैर के पेड़ों का घना जंगल था। इसी वजह से मां काली का नाम खैरी माता पड़ा। पहाड़ी के आसपास बसे गांव का नाम भी खैरी हो गया। मंदिर में दतिया शहर के अलावा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। सुबह और शाम के समय यहां अधिक भीड़ रहती है। श्रद्धालु पैदल, वाहनों से और जबारे लेकर माता के दर्शन करने आते हैं। चैत्र नवरात्र में तीन दिन का मेला, चढ़ाए जाते हैं जबारे चैत्र नवरात्र में मंदिर पर तीन दिन विशेष आयोजन होते हैं। सप्तमी को भद्रकाली के दिन के रूप में मानते हुए जिले भर से श्रद्धालु जल चढ़ाने और पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। नवमी पर जबारे चढ़ाए जाते हैं, जबकि बारस को मेला लगता है। इस दौरान मंडलियों में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। कुछ श्रद्धालु गाल में लोहे की सरांग छेदकर भजन-कीर्तन करते हुए आते हैं और जबारे के साथ सरांग अर्पित करते हैं। शारदीय नवरात्र में मंदिर पर लख्खी भंडारे का आयोजन भी होता है। श्रद्धालुओं के सहयोग से हुआ मंदिर का विकास समय के साथ मंदिर में कई निर्माण और विकास कार्य हुए हैं। ये कार्य श्रद्धालुओं और मंदिर कमेटी के सहयोग से कराए जा रहे हैं। मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु माता को भेंट चढ़ाते हैं। मंदिर की सीढ़ियों पर दर्जनों घंटे लगे हैं, जिनमें कुछ का वजन एक से दो क्विंटल तक बताया जाता है। करीब 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़ने के बाद श्रद्धालु माता के दरबार तक पहुंचते हैं। दतिया के महाराजा वीरसिंह जू देव ने कराया था मंदिर का निर्माण बताया जाता है कि दतिया के महाराजा वीरसिंह जू देव ने वर्ष 1658 में खैरी माता मंदिर का निर्माण कराया था। उस समय पहाड़ी के आसपास खैर के पेड़ों का विशाल जंगल था और पहाड़ी को खैरागढ़ के नाम से जाना जाता था। स्थानीय मान्यता के अनुसार, माता ने दतिया नरेश को स्वप्न में अपने विग्रह के सेंवढ़ा स्थित सनकुआं में होने की जानकारी दी थी। राजा वहां पहुंचे तो उन्हें माता का विग्रह मिला। वे उसे हाथी-घोड़ों के माध्यम से दतिया लाए और महल में स्थापित करने का प्रयास किया। मान्यता है कि इसके बाद माता ने स्वप्न में विग्रह को खैरागढ़ में स्थापित करने का निर्देश दिया। तब राजा ने माता को खैरी पहाड़ी पर विराजित कराया। माता को मनकामेश्वर देवी के रूप में भी पूजा जाता है। उनका स्वरूप दुर्गा माई से जुड़ा माना जाता है, जबकि श्रद्धालु उनकी पूजा काली माता के रूप में करते हैं। स्थानीय लोगों के बीच ऐसी मान्यता भी प्रचलित है कि माता की कृपा से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।