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टीएन शेषन से जब भिड़ गए थे लालू यादव, बिहार में ऐसे पलट दिया था चुनाव का नैरेटिव

TN Seshan vs Lalu Yadav मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आज देशभर में विपक्षी दलों का विरोध प्रदर्शन जारी है. करीब 31 साल पहले भी बिहार में मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य की सरकार के बीच ऐसा ही टकराव देखने को मिला था. उस वक्त देश के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन थे और बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखें बार-बार बदली जा रही थीं. शेषन के फैसलों से तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव नाराज थे. उन्होंने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी आपत्ति जताई और चुनावी सभाओं में इसे राजनीतिक मुद्दा बना लिया. दिलचस्प बात यह है कि जिस चुनाव प्रक्रिया को लेकर लालू प्रसाद शेषन पर हमलावर थे, उसी के बीच उन्हें अपने पक्ष में राजनीतिक संदेश देने का मौका भी मिल गया.
'फिर ई शेषनवां कौन है?', लालू ने उठाए थे सवाल
उस दौर में बिहार के तत्कालीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) आरजेएम पिल्लई से बातचीत के दौरान लालू प्रसाद यादव ने कथित तौर पर कहा था, “बिहार का मैं मुख्यमंत्री हूं और तुम मेरे अफसर हो. फिर ई शेषनवां कौन है? बीच में काहे टपकता रहता है? बार-बार फैक्स भेजता रहता है! एक बार चुनाव हो जाने दो, सब फैक्स-वैक्स उड़ा देंगे.”
इसके बाद लालू प्रसाद ने टीएन शेषन के साथ अपने टकराव को चुनावी मुद्दा बना लिया. उन्होंने अपनी सभाओं में शेषन के फैसलों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. शेषन ब्राह्मण समुदाय से आते थे. लालू प्रसाद अपने भाषणों में आरोप लगाते थे कि पिछड़े वर्ग के बेटे को सत्ता की कुर्सी से हटाने के लिए इस तरह के फैसले लिए जा रहे हैं. इस तरह उन्होंने चुनावी अभियान के दौरान सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश की.
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हारी हुई बाजी को जीत में बदलने की रणनीति
संकर्षण ठाकुर अपनी किताब बंधु बिहारी में इस घटनाक्रम का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि लालू यादव सार्वजनिक सभाओं में शेषन पर निशाना साधते थे, लेकिन अंदर ही अंदर लंबी चुनाव प्रक्रिया से खुश थे. इसकी वजह यह थी कि उन्हें चुनाव प्रचार के लिए पर्याप्त समय मिल रहा था.
चुनावी सभाओं में शेषन को निशाने पर लेकर लालू प्रसाद यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि पिछड़े वर्ग के नेता को सत्ता से हटाने की कोशिश की जा रही है. इस राजनीतिक रणनीति का उन्हें कितना लाभ मिला, यह चुनाव परिणामों में भी दिखाई दिया. वर्ष 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले जनता दल ने 1990 के मुकाबले अधिक सीटें हासिल कीं और राज्य में अपनी सत्ता बरकरार रखी.
इस जीत की चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय कहते हैं कि उस समय लोगों के बीच यह चर्चा थी कि बैलेट बॉक्स से जिन्न निकल आया है. ऐसा कुछ नहीं था. कोई जिन्न नहीं था. टीएन शेषन की सख्ती के कारण चुनाव प्रक्रिया में बदलाव आया और पहले मतदान से दूर रहने वाले गरीब तथा दलित वर्ग के लोग भी वोट डालने के लिए निकले. इससे मतदान प्रतिशत बढ़ा और लालू प्रसाद को 1990 के मुकाबले अधिक सीटें हासिल करने में मदद मिली.
बिहार में निष्पक्ष चुनाव कराना शेषन के लिए बनी प्रतिष्ठा की लड़ाई
दरअसल, उस दौर में बिहार में चुनाव के दौरान बूथ कैप्चरिंग और हिंसा की घटनाएं आम थीं. चुनाव को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन लगातार प्रयास कर रहे थे. इसी क्रम में 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों में कई बार बदलाव किया गया.
बिहार की चुनावी परिस्थितियों पर शेषन ने विशेष चिंता जताई थी. पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा था, “बिहार पर थोड़ा अतिरिक्त ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि आखिर में ऐसा नहीं कहा जाना चाहिए कि बाकी हर जगह शानदार काम हुआ, लेकिन बिहार में हम असफल रहे.”
शेषन की सख्ती से लालू प्रसाद नाराज थे, वहीं मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए बिहार में निष्पक्ष चुनाव कराना बड़ी चुनौती बन गया था. दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब द ब्रदर्स बिहारी में इस टकराव का उल्लेख किया है. उनके मुताबिक, लालू के बिहार में निष्पक्ष चुनाव कराना शेषन के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था.
चुनाव के दौरान हिंसा और बूथ कब्जाने की घटनाओं को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की तैनाती की गई. शेषन ने बिहार में करीब 650 कंपनियां अर्धसैनिक बलों की तैनात कराईं और विधानसभा चुनाव चार चरणों में संपन्न कराए. चुनाव की तारीखों में बदलाव और सुरक्षा के कड़े इंतजाम इसी कोशिश का हिस्सा थे, ताकि मतदान प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष बनाया जा सके.
बिहार में चुनावी हिंसा
'आसपास बम फटेंगे और गोली चलेंगी'
1995 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सुरक्षा की चुनौतियां कितनी गंभीर थीं, इसका जिक्र पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी किया है. उस समय कुरैशी बिहार में चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में तैनात थे.
उस दौर को याद करते हुए उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था, “मुझे 1995 का बिहार चुनाव याद है, जब शेषन ने चुनावी हिंसा को लेकर मुझसे कहा था कि चिंता मत करो, कुछ नहीं होगा, सिवाय आपके आसपास बम फटने और गोली चलने के.”
कुरैशी के मुताबिक, उस चुनाव के दौरान उनके साथ ऐसा ही हुआ. जिस जगह वह खड़े थे, उससे कुछ ही दूरी पर दो बम धमाके हुए. यह घटना बताती है कि उस समय बिहार में चुनाव कराना प्रशासन और निर्वाचन आयोग के लिए कितनी बड़ी चुनौती थी.
टीएन शेषन की सख्ती, चुनाव की तारीखों में बदलाव और लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक अभियान के बीच 1995 का बिहार विधानसभा चुनाव कई मायनों में यादगार रहा. एक तरफ निर्वाचन आयोग निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने में जुटा था, तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद ने शेषन के फैसलों को अपने चुनावी विमर्श का हिस्सा बना लिया. अंततः चुनाव में जनता दल की जीत ने बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद की स्थिति को और मजबूत किया.
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